भारत में कोरोना का प्रकोप, पहली मौत कर्नाटक में दर्ज!

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महिला दिवस खत्म, अब हकीकत पर आ जाईये!

कल पूरे विश्व ने अंतर्राष्ट्रूय महिला दिवस मनाया. भारत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बार महिलाओं को सम्मान देने की नायाब पहल की. उन्होंने एक दिन के लिए अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स भारत की किसी प्रेरणादायक स्त्री को देने की घोषणा की. इस पहल का नाम रखा गया, #Sheinspireus . जिस लड़की को इस पहल के लिए चुना गया उसने बड़ी ही सरलता से मोदी के ऑफर को नकार दिया.  

कौन है लिसिप्रिया

जलवायु परिवर्तन को लेकर काम करने वाली कार्यकर्ता लिसिप्रिया कंगजुम की उम्र आठ साल है. सरकार ने लिसिप्रिया कंगजुम को एक प्रेरणा देने वाली स्त्री बताया. हालांकि लिसिप्रिया ने इस सम्मान पर अपनी नाराज़गी जताई है. उनका कहना है कि यदि आप मेरी आवाज़ नहीं सुन रहे हैं तो कृपया मेरा सम्म्न ना करें. @mygovindia के ट्विटर हैंडल से लिसिप्रिया कंगजुम से जुड़ा एक ट्वीट किया गया. इस ट्वीट में वताया गया कि लिसिप्रिया कंगजुम मणिपुर की एक बाल पर्यावरण कार्यकर्ता हैं. 2019 में उन्हें डॉ. ए.पी.जे अब्दुल कलाम चिलड्रेन अवार्ड, विश्व बाल शांति पुरस्कार और भारत शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया है.

क्या सरकार है महिला विरोधी

लिसिप्रिया का इस तरह सरकार की पहल नकार देना अपने आप में एक बड़ा कथन है. महज़ 8 साल की एक कार्यकर्ता जो जलवायु परिवर्तन पर काम करती है. उसे ये बात कितनी स्पष्टता से मालूम है कि ये सरकार महिलाओं की आवाज़ नहीं सुन रही. इस सरकार ने महिलाओं के लिए किताबी वादों के और कुछ नहीं किया है. भारत में हर दिन कम से कम 90 रेप केस दर्ज होते हैं. केस दर्ज होने की प्रक्रिया अपने आप में संघर्षपूर्ण है. इसलिए आज भी ऐसे बहुतेरे केस हैं जो दर्ज नहीं होने दिए जाते, दबा दिए जाते हैं, साहस नहीं जुटा पाते. ऐसे केसों का कोई आंकड़ा नहीं है. इनमें से बस 32 फीसदी केस सुनवाई तक पहुंच पाते हैं. आज भी अदालत में एक लाख से ज्यादा रेप केसों की फाइलें धूल खा रहे हैं. महिलाओं के प्रति हिंसा का दर भारत में सबसे ज्यादा है. कितना मुश्किल है कितने पुरूषों के लिए एक महिला को बस अपने जितना ही इंसान समझना!

येस बैंक ने निवेशकों को कहा NO!

येस बैंक फिलवक्त वित्तीय संकट से गुज़र रहा है. इस संकट के खत्म होने के कोई आसार भी अभी तो नज़र नहीं आ रहे हैं. येस बैंक ने ग्राहकों के लिए 50 हज़ार रुपए निकालने की सीमा तय कर दी है. अब एक महीने में ग्राहक 50 हज़ार रूपए तक ही निकाल सकते हैं. ग्राहकों में इस निर्णय के बाद काफी नाराज़गी है. बैंक ने ज़्यादातर ऐसी ही कंपनियों को पैसा दे रखा है, जिनकी भी स्थिति खस्ताहाल है.

 कौन सी कंपनियों को लोन बांटा ?

येस बैंक ने जिन कंपनियों को लोन दिया है, उनका इतिहास और मौजूदा स्थिति बेहाल है. इन सभी कंपनियों का वित्तीय लेखा-जोखा साफ नहीं है. इस लिस्ट में एलएंडएफएस, दीवान हाउसिंग, जेट एयरवेज, कॉक्स एंड किंग्स, सीजी पावर और कैफे कॉफी डे जैसी कंपनियां शामिल हैं, जिन्हें यस बैंक ने लोन दिया.  इन सभी कंपनियों का एन.पी.ए दर रिकॉर्ड पर है.

शेयर बाज़ार में येस बैंक की हालत!

येस बैंक शेयर बाज़ार में भी अपनी सबसे खराब स्थिति से गुज़र रहा है. कभी जो शेयर 1400 रूपए का बिकता था, उसका मूल्य गिरते- गिरते मात्र 36 रूपए हुआ. आज की तारीख में येस बैंक के शेयर की कीमत 13 रुपए है. जो येस बैंक गुरूवार को स्टॉक मार्केट में 36.85 रुपए के भाव पर बंद हुआ, वो आज शुक्रवार को 85 फीसदी नीचे गिरकर 5.55 रुपए हो गया.

क्या है राणा कपूर का मामला?

राणा कपूर भारतीय कॉर्पोरेट वर्ल्ड के बड़े खिलाड़ी माने जाते हैं. येस बैंक की शुरूआत 2004 में राणा कपूर ने अपने एक रिश्तेदार के साथ मिलकर की थी. 1000 से ज़्यादा शाखाओं और 1800 से ज़्यादा ए.टी.एम वाला येस बैंक देस का चौथा सबसे बड़ा निजी बैंक  है. राणा कपूर ने 2016 में मोदी सरकार द्वारा लायी गई नोटबंदी के लिए तारीफ की झड़ी लगा दी थी. साल 2018 में आर.बी.आई को येस बैंक की बैलेंस शीट और एन.पी.ए में गड़बड़ी लगी. इसलिए राणा कपूर को आर.बी.आई ने हटा दिया था. राणा के हटने के बाद से येस बैंक की स्थिति और भी गिरती गई.  

सरकार जब विनिवेश के नशे में मशगूल है, तब देश के निजी बैंकों की हालत पस्त है!

एक ओर भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने येस बैंक के ग्राहकों को भरोसा दिलाया है कि ये संकट जल्दी ही खत्म होगा. वहीं दूसरी तरफ सरकार 28 पी.एस.यू को बेचने को तैयार बैठी है. निजी क्षेत्र की कंपनियां एक के बाद एक धराशायी हो रही हैं. पर सरकार को अभी भी निजीकरण का भूत सवार है. जेट एयरवेज़, पी.एम.सी बैंक, एयर इंडिया और अब येस बैंक इसके गवाह हैं. इस लिस्ट की भविष्य में बढ़ने की संभावनाएं प्रबल हैं.   

गांधी के देश में गांधी की संदेश पहुंचाने पर दूसरी बार जेल गए सत्याग्रही!

नागरिक सत्याग्रह के यात्रियों को एक बार फिर फतेहपुर में आज दिन में 12 बजे के आस-पास गिरफ्तार कर लिया गया है. यह यात्रा 2 फरवरी 2020 को चौरी-चौरा (गोरखपुर) से शुरू हुई थी. यात्रा राजघाट (दिल्ली) तक प्रस्तावित है. सत्याग्रही अभी इस यात्रा के दूसरे चरण में वाराणसी से कानपुर की ओर बढ़ रहे थे. आज सुबह 10 बजे अंबेडकर पार्क, फतेहपुर से आगे बढ़नी थी. हालांकि सत्याग्रियों ने कल रात   सोशल मीडिया में पोस्ट किया कि पुलिस लगातार उन्हें या तो कानपुर छोड़ने या फिर डीटेन करने की धमकी दे रही थी. ठीक इसी तरह 11 फरवरी को भी यह यात्रा ग़ाज़ीपुर में यू.पी पुलिस द्वारा रोकी गई थी. गिरफ्तार होने वालों में मनीष शर्मा, प्रियेश पांडेय, विवेक मिश्र, आशुतोष राय (आर्य भारत), जितेश मिश्रा, नीरज राय, प्रभात कुमार, राजवेंद्र, राजन तिवारी हैं. इनमें ज़्यादातर अलग-अलग विश्वविद्यालयों के छात्र हैं.

क्या हैं गिरफ्तारी के कारण?

जो कारण समझ में आता है, वह इस प्रकार है। समझा जा रहा है कि नफरत, हिंसा और सांप्रदायिकता के खिलाफ संदेश देता हुआ चल रहा यह जत्था यू.पी पुलिस की आंखों में किरकिरी की तरह चुभ रहा है।
प्रशासन नहीं चाह रहा था कि गांधी के सत्य और अहिंसा के रास्ते पर चल रहा यह जत्था लोगों के बीच पहुंचकर अपना संदेश दे। इस कारण प्रशासन और यू.पी पुलिस लगातार सत्याग्रहियों को और उनकी इस यात्रा को रोकने की हर संभव कोशिश लगातार कर रही है.  

क्यों जरूरी है ये यात्रा?

इस यात्रा का उद्देश्य CAA-NRC के विरोध के दौरान यू.पी. में जो सांप्रदायिक बंटवारा साफ-साफ नज़र आ रहा है, उसे शांत करना है. ये सभी सत्याग्रही शहर, गांव और कस्बों में लोगों के बीच गांधी और अंबेडकर के सामाजिक सौहार्द और अमन का संदेश पहुंचा रहे हैं. सत्याग्रहियों के मुताबिक वर्तमान परिवेश में वह देख रहे हैं देश की राजनीतिक व्यवस्था हिंदू-मुसलमान, भारत-पाकिस्तान, नफरत फैलाओ राज करो, पक्ष-विपक्ष के आरोप प्रत्यारोप तक सीमित हो गई है।

राजनीतिक दल नफरत फैलाकर जनता के वोट से सत्ता में आ रहे हैं और जनता के लिए जरूरी ज्वलंत मुद्दों पर चर्चा, समाधान का काम ठप पड़ा है। मनीष का कहना है कि ऐसे में जरूरी है कि लोगों को जागरुक किया जाए। उन्हें सद्भावना, अहिंसा, नागरिकों के कर्तव्य, आपसी मेलजोल, प्रेम, सहयोग, साझीदारी से विकास के बारे में बताया जाए।

तो क्या गांधी और अंबेडकर के विचार से डरती है यू.पी सरकार?

तो अब सवाल उत्तरप्रदेश सरकार पर उठता है कि क्या सरकार को 10,12 पदयात्रियों से इतना डर है कि इनको बार-बार जेलों में डाला जा रहा है? क्या अब समाज को प्रेम,  भाईचारा,  सौहार्द की बातों से भी खतरा है? इस देश के नागरिकों को गांधी और अंबेडकर के समाज की परिकल्पना दिखाना अपराध है? क्या सरकार को प्रेम और शांति से ही शांतिभंग का डर है? और अगर ऐसा है तो इन सत्याग्रहियों से इतर इसी प्रदेश में ऐसी कई रैलियां होती हैं जहां स्पष्ट तौर पर शांतिभंग करने के लिए पर्याप्त भाषण दिए जाते है.

देवी : समाज का वो सच जो आत्मग्लानि से भर देगा!

एक दो दिन पहले एक शॉर्ट फिल्म यू ट्यूब पर रिलीज़ हुई. नाम है- देवी. अब नाम सुनते ही लगता है महिला सशक्तिकरण/ उत्पीड़न पर ही होगी. ऐसा क्यों?  इसका कारण है हमारा समाज. हम किसी भी कॉन्सेप्ट/विचार को तभी इज्जत देते हैं जब हम उससे डरना शुरू कर देते हैं. अब देखिए ना, कितनी सीधी बात है कि औरतों की गरिमा का ख्याल हमेशा रहे. उन्हें भी वो सारे अधिकार हैं जिनकी धौंस आप औरतों पर ही दिखाते हैं. वो भी उतनी ही इंसान हैं जितने आप.

पर शायद पुरूषों के लिए तब तक ये समझ के बाहर रहेगा जब तक उन्हें इसमें कुछ डरावना या पाप जैसा ना दिखे. पाप कैसे होता है? जब आप धर्म का भय दिखाएंगे. तो चलो, महिलाओं को देवी बना दिया जाए. क्योंकि देवी के साथ अन्याय नहीं होना चाहिए. भले ही आपके देश में हर दिन कम से कम 90 रेप केस दर्ज होते हैं. कितने दर्ज नहीं होते, नहीं किए जाते, दबा दिए जाते हैं, साहस नहीं जुटा पाते, उनका कोई आंकड़ा नहीं है. इनमें से बस 32%  केस सुनवाई तक पहुंचते हैं. और आज भी 1 लाख के लगभग रेप केस अदालत की फाइलों में धूल खा रहे हैं. भारत ऐसा देश है जहां हर संभव वस्तु,मौसम,प्रकृति आदि के तत्वों को देवी का स्वरूप देकर पूजा जाता है. लेकिन फिर भी महिलाओं के प्रति हिंसा भारत में सबसे ज़्यादा है. कितना अजीब है ना. कितना मुश्किल होता है कितने पुरूषों के लिए एक महिला को बस अपने जितना ही इंसान समझना?  

बहरहाल, देवी एक जरुरी फिल्म है. समाज के हर वर्ग की स्त्री को बलात्कार पीड़ित दिखाया गया है. जो कि हमारे समाज का कड़वा सच है. एक कमरा, कुछ महिलाएं, सब अलग अलग क्लास,आयु,पहनावे,भाषा,विचार,धर्म वालीं. बस एक बात समान है- बलात्कार और उसके बाद मौत. कमरे की घंटी बार बार बज रही है. बाहर भी इनके जैसी ही कोई खड़ी होगी. टी.वी पर लगातार रेप की खबर आ रही है. अंदर बैठी औरतें जगह की कमी, गर्मी, कपड़ों, भाषा जैसी आम चीज़ों के साथ ही अपने अपने मौत के तरीकों के बारे में भी नोकझोक कर रही हैं. और आखिर में काजोल महज़ 4,5 साल की बच्ची को कमरे में लेकर आती हैं.

ये जो अंत में होता है वो हर एक दर्शक को आत्मग्लानि से भर देगा. हम सब इस समाज का हिस्सा हैं जहां से निकल कर ये औरतें इस कमरे में खुद को कैद करती जा रही हैं. फिल्म खत्म होने के साथ कहीं ना कहीं हमारे मन में सचमुच के एक ऐसे कमरे की कल्पना तैरने लगती है. एक ऐसा कमरा जहां औरतें खुद को समाज की हैवानियत से दूर सुरक्षित पाती हैं. जहां हर वो औरत दस्तक दे रही है जिसे समाज से घिन होते जा रही है. एक कमरा जहां आधी आबादी हर घंटे, हर मिनट पहुंच रही है, ताकि कम से कम मौत के बाद तो उसे वो सम्मान और सुरक्षा मिल सके जो जीते जी हम और हमारा देश नहीं दे पाए. शायद एक कमरा तो क्या अपनी राजधानी दिल्ली जितना बड़ा शहर भी उन औरतों के लिए काफी नहीं होता. शायद दिल्ली या भारत के किसी भी शहर में इतनी ताकत नहीं है कि वो उन सभी औरतों और उनके दर्द और गुस्से को समा पाए. खैर, खैर मनाइए ये कल्पना है. और दिल्ली सेफ भी कहां है! और एक बात, भारत के लगभग हर शहर हर गांव में एक ना एक रेप पीड़ित और एक देवी मंदिर जरूर मिल जाएगा.

लोकपाल का नया प्रारूप!

मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल के आखिरी समय में लोकपाल की नियुक्ति कर विपक्ष के हाथ से बड़ा मुद्दा छीना था. पर अब केंद्र सरकार ने लोकपाल की नियुक्ति के करीब एक साल बाद उसके लिए एक प्रारूप जारी किया है. इस प्रारूप के मुताबिक अगर वर्तमान या पूर्व प्रधानमंत्री के खिलाफ कोई शिकायत आती है तो लोकपाल की पूरी टीम मिलके तय करेगी कि जांच शुरु की जानी चाहिए या नहीं. सोचने योग्य बात तो ये है कि अगर पूरी बेंच द्वारा शिकायत को खारिज किया जाता है तो इसका कोई कारण नहीं बताया जाएगा.

क्या है लोकपाल ?

 लोकपाल प्रधानमंत्री से लेकर चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी तक के खिलाफ भष्टाचार के मामले की सुनवाई कर सकता है। हालांकि सेना को लोकपाल के दायरे से दूर रखा गया है।  साथ ही वह इन सभी की संपत्ति पर भी कर प्रश्न उठा सकता है। विशेष परिस्थितियों में लोकपाल को किसी आरोपी के खिलाफ अदालती ट्रायल चलाने और 2 लाख रुपये तक का जुर्माना लगाने का भी अधिकार होगा। 

प्रधानमंत्री और लोकपाल

2 मार्च को जारी किए गए प्रारूप के अनुसार मौजूदा या पूर्व प्रधानमंत्री के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायत करने पर, इसकी सुनवाई लोकपाल की पूरी बेंच करेगी और इसका फैसला लेगी कि इस मामले में जांच होनी चाहिए या नहीं। लेकिन अगर बेंच शिकायत को खारिज करती है तो जांच के रिकॉर्ड को सार्वजनिक नहीं किया जाएगा और ना ही इसकी जानकारी किसी को उपलब्ध कराई जाएगी। साथ ही प्रधानमंत्री के खिलाफ जांच के लिए कम से कम बेंच के दो तिहाई सदस्यों का एकमत होना जरूरी है।

केंद्रीय मंत्रियों और लोकपाल

केंद्रीय मंत्री या फिर सांसद के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने पर लोकपाल के कम से कम तीन सदस्य इस बात का निर्णय लेंगे कि क्या इस शिकायत को स्वीकार किया जाए या नहीं। लोकपाल के गठन के बाद लोकपाल जस्टिस (सेवानिवृत्त) चंद्र घोष शिकायतों को अब लोकपाल की जांच इकाई के पास भेज सकते हैं। जांच इकाई फिर ये आदेश दे सकती है कि मामले की शुरुआती जांच होनी चाहिए या नहीं। अगर प्रथम दृष्टया यह तय होता है कि मामले की जांच होनी चाहिए तो लोकपाल इस मामले को सीबीआई या अन्य किसी जांच एजेंसी को दे सकता है।


लोकपाल का गठन भारत के इतिहास में कितना महत्वपूर्ण है, इसका गवाह 2011 का अन्ना आंदोलन है.  लोकपाल बिल एक बड़े स्तर पर हुए संघर्ष का परिणाम है. ये संघर्ष भ्रष्टाचार के खिलाफ था. भ्रष्टाचार के आगे सभी लोगों को फिर चाहे वो प्रधानमंत्री हों या चाय वाला रामू एक स्तर पर लाकर खड़ा करना इस संघर्ष का मुख्य उद्देश्य था. नये प्रारूप के बाद प्रधानसेवक को मिली रियायतें तो कुछ और ही कहानी कह रही हैं.

28 और सार्वजनिक कंपनियां बिकने की कग़ार पर!

मोदी सरकार ने इस वक्त देश की 28 सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों (पी.एस.यू) को बेचने की तैयारी शुरू कर दी है. इन सभी कंपनियों की हिस्सेदारी बेचने के लिए सरकार ने सैद्धांतिक रूप से हामी भर दी है. 

लोकसभा में जब तमिल नाडु के डी.एम.के सांसद पी वेलुसामी ने ऐसी कंपनियों का ब्यौरा मांगा जिन्हें हिस्सेदारी बेचने के लिए चिन्हित किया गया है. इसके जवाब में वित्त राज्य मंत्री अनुराग ठाकुर ने 28 कंपनियों को बेचने की मंशा जाहिर की.

बेचने का आधार क्या है?

अनुराग ठाकुर ने अपने लिखित जवाब में इन कंपनियों को बेचने का आधार प्राथमिकता को बताया है. उनके जवाब के अनुसार लाभ-हानि के आधार पर विनिवेश का फैसला नहीं लिया जाता है, बल्कि कंपनियों के क्षेत्रों की प्राथमिकता ही ऐसे किसी भी विनिवेश का आधार होती है. 

 एक न्यूज़ एजेंसी के मुताबिक, वित्त राज्य मंत्री ने बताया कि वर्ष 2019-20 के दौरान सरकार ने विनिवेश के लिए 65,000 करोड़ का लक्ष्य रखा. इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सरकार रणनीतिक बिक्री के साथ हिस्सेदारी बेचने जैसी नीतियों का सहारा लेती है. 

वित्त राज्य मंत्री अनुराग ठाकुर ने लिखित जवाब में जिन कंपनियों को विनिवेश के लिए चिन्हित किया था,   वो कंपनियां हैं-

1- स्कूटर्स इंडिया लि.,

2- ब्रिज ऐंड रूफ कंपनी इंडिया लि,

3- हिंदुस्तान न्यूज प्रिंट लि.,

4- भारत पंप्स ऐंड कम्प्रेसर्स लि,

5- सीमेंट कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लि.,

6- सेंट्रल इलेक्ट्रॉनिक्स लि,

7- भारत अर्थ मूवर्स लिमिटेड,

8- फेरो स्क्रैप निगम

9- पवन हंस लिमिटेड,

10- एअर इंडिया और उसकी पांच सहायक कंपनियां और एक संयुक्त उद्यम,

11- एचएलएल लाइफकेयर,

12- हिंदुस्तान एंटीबायोटिक्स लि.,

13- शिपिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया,

14- बंगाल केमिकल्स एंड फार्मास्यूटिकल्स लिमिटेड.

15- नीलांचल इस्पात निगम लिमिडेट में विनिवेश की सैद्धांतिक मंजूरी बीते आठ जनवरी को दी गई.

16- हिंदुस्तान प्रीफैबलिमिटेड (HPL),

17 – इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट्स इंडिया लिमिटेड,

18- भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन

19- कंटेनर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (CONCOR)

20- एनएमडीसी का नागरनकर स्टील प्लांट,

21- सेल का दुर्गापुर अलॉय स्टील प्लांट, सलेम स्टील प्लांट और भद्रावती यूनिट.

22- टीएचडीसी इंडिया लिमिटेड (THDCIL)

23- इंडियन मेडिसीन ऐंड फार्मास्यूटिकल्स कॉरपोरेशन लिमिटेड (IMPCL),

24- कर्नाटक एंटीबायोटिक्स,

25-इंडियन टूरिज्म डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (ITDC) की कई ईकाइयां

26- नॉर्थ ईस्टर्न इलेक्ट्रिक पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (NEEPCO)

27- प्रोजेक्ट ऐंड डेवलपमेंट इंडिया लि.

28- कामरजार पोर्ट

पहले कौन सी ऐसी कंपनियों को बेचा गया है?

मौजूदा वित्त वर्ष के लिए सरकार ने विनिवेश के जरिए 1 लाख 5 हजार करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य रखा था, लेकिन सरकार अपने लक्ष्य के आसपास भी नहीं है. सरकार ने अबतक करीब 17 हजार करोड़ रुपये ही जुटाएं हैं. लेकिन इतने ही पैसे जुटाने में काफी कंपनियों की हिस्सेदारी बेची जा चुकी है.

पिछले साल 20 नवंबर को सरकार ने फैसला किया था कि बीपीसीएल समेत 5 बड़ी कंपनियों के हिस्से बेचे जाएंगे. ये कंपनियां हैं- BPCL, CONCOR, SIC, THDC और NEEPCO. उदाहरण के लिए, NTPC  का विनिवेश प्रतिशत साल 2014 में 0.04% था जो कि साल 2017 में बढ़कर 5% हो गया था. 

देश की अर्थव्यवस्था की स्थिति किसी भी तरह से फिलहाल ऊपर उठती हुई तो नहीं दिख रही है. इस आर्थिक सुस्ती या मंदी जो भी कह लें, इससे निबटने के लिए सिर्फ रिजर्व बैंक से मोटी मोटी रकम उधार लेना काफी नहीं है. विनिवेश कितना कारगर रहेगा ये भी देर-सबेर सभी को समझ आ ही जाएगा. लेकिन तब तक आप हम बस यही मना सकते हैं कि हम या हमारे जानने वालों के घर चूल्हा जलता रहे.

BHU : From ideological clashes to violence!

DISCLAIMER: This piece was written back in 2018 when BHU was undergoing political turmoils and violence among ideologies.

September has been a month of protests and student movements in Banaras Hindu University. Just like the events of September 23 last year, September 23, 2018, was also a vivid spectator to the same. A group of girls who were remembering their year of struggle was attacked and beaten by members of the Akhil Bharatiya Vidyarthi Parishad (ABVP).

But first, let’s look back at the chronology of events leading up to this.

In September 2017, a mass movement emerged after a girl was molested in the university campus. The administration paid no heed to her complaint, after which the anger of the students poured onto the streets in the form of a peaceful protest. In a mass movement, female students demanded gender-equal hostel rules, and better security and safety. In response, they faced insensitive comments from BHU vice-chancellor GC Tripathi. The protesting students were brutally lathi-charged on the night of September 23, 2017, to crush the protest. Following this, the central government faced immense backlash and was forced to send the BHU VC on leave.

On September 23, 2018, female students decided to remember this day as a mark of protest in the history of BHU. They decided to hold a street play, a poem recitation and an open mic programme. ABVP members tried to disrupt the nukkad natak (street play) in Vishwanath Temple. Then at the open mic event at MMV Gate, the ABVP members chanted sexist and derogatory slogans and manhandled students participating in the programme. Girls present allege that slogans such as “ladkiyon ka ek hi moto, khao, peeyo sath mei loto (Girls have a single moto, eat drink and roam)” were raised by the ABVP. ABVP members of the university at the event also said they would “eliminate” girls demanding azaadi, calling them “anti-national” and “JNU type”, while vowing to not allow BHU to become another JNU.

At midnight on September 23, a first information report was lodged by protesting female students against 10 ABVP members under Sections 147, 354, 323, 504 and 506 of the Indian Penal Code for assaulting the modesty of girls, spreading violence and interrupting the programme.

When Newslaundry spoke to the Chief Proctor Royna Singh about what happened, she said, “If the students had taken a proper written notice for the programme, the administration would have provided them with proper security.”

Another incident occurred on September 24, where medical science and arts faculty students clashed, throwing petrol bombs. The campus erupted in violence. After the violence, six hostels were vacated and the university is now closed for the next three days.

On September 26, the ABVP lodged a counter FIR against 15 students who were supporting the female students in their protest. The FIR is lodged under Sections 153- B, 147, 323, 325, 504 and 506.

This has been a tradition in BHU—whenever the university starts developing an ideological space, violence follows, after which the space for debate and discussion shrinks. In the past, various students staging peaceful protests have been suspended for raising their voice. 

In the last two decades, BHU has seen complete ideological silence and zero student activism. The campus has been a hub for violence. The administration has tried to dilute student protests by letting a few groups indulge in violence while shielding them. The ABVP has a stronghold on the campus and doesn’t want different views to exist in the university.

The situation started changing over the last three years when groups such as the Joint Action Committee – BHU—a joint forum of different student organisations—tried to build an environment of debate, discussion and dissent. Independent female students started raising their voices over the past year, and have taken to the streets on different occasions. The ABVP witnesses this as an ideological loss in the campus as issues such as freedom, equality and gender have come to the forum of discussion.

A university should strive to be a space for discussion and debate, but when this space is explored in BHU to secure equal rights and challenge patriarchal mindsets, the administration tries to suppress it. In the case of female activists, their characters are also assassinated through online trolling.

Unwrapping Rajasthan Tales!

(November, 2019)

It was friday evening. I was tired. I opened the lock, did not even tried to reach out to the switch the lights on and threw myself on the bed. I pushed my face to cushion and hoped that no one calls me for next few hours. But minutes later, Himanshu called and told me he is outside my hostel. I picked a shawl,draped it around and went outside. Rishabh and himanshu were waiting there to ask me something. I knew that expression on their faces. They were upto something exciting. They told me they were going to the Pushkar Fair for the weekend and wanted me to join them. First I said yes, then I thought about everything else. I had to convince my parents. Next, I called Tej to ask if Devesh and he were coming or not. They were already in the plan. I woke up Jagriti who was just like me- tired and sleepy. She could not decline the offer. I met Mrityunjay 20,25 minutes later and convinced him too. Within few hours 7 of us were lying haphazardly on the floor of a private bus to jaipur. Rishabh and Himanshu were unanimously decided to bargain and save most of our money throughout the trip and no wonder the proved themselves. They convinced the bus conductor to take us to Jaipur for 150 bucks each. Which otherwise would have costed us 400 bucks each may be!

We had no idea what will happen next day. We did not plan or decide anything other than going to Pushkar Fair. It was still dark when we reached Jaipur. I insisted everyone to watch sunrise from some place higher than the rest of the city. Therefore, I asked Rishabh (the only expert among us) to find some place higher and quieter than the most of the Jaipur to watch the sun rise. I kinda have this thing to watch sunrises and sunsets from all the cities I visit ever.

So about 30mins later, we except Rishabh and Devesh were panting on our way upto to hill area of Jaigarh Fort of Jaipur. After about 4 kms of trekking the surroundings felt suitable and we settled ourselves and waited for the sun to rise. We had a distant yet comforting view of the Jal Mahal Palace. We could see the sky turning pink and orange. We could hear the peacocks chanting somewhere around us. We could feel the fresh air. We could feel that we were on our “adventure”. We laughed, we talked, we clicked pictures then I went numb for few seconds when I saw the water of the lake of Jal Mahal Palace turn orange and then golden.

Rishabh a.k.a Apna Traveller!

I was finally looking at the sunrise in some different city. I was living my thing. I cannot put that feeling of looking at the sunrays reflected by the very water of the Jal Mahal lake into words. It instantly reminded me of Varanasi morning. Obviously it was different. But it was soothing, it was calm. It was, for that moment, all I needed. It strained out all the tiredness from the previous night. I looked at Rishabh for a while. He was clicking pictures and I wish I could have thanked him then and there but, guess who sucks at confessing. Duh. Well, we had had enoughof the sunrise. We decided to crawl down the hill. But trust me its tough. Rajasthan has a very uneven, thorny kinda ladscape. That hill was not at all supposed to be trekked and explored. But we did. On our way down, I fell a lot of times tbh. All of us did. Tej and I were the ones who were the slowest throughout. Somewhat because I insisted him to click my pictures. He clicked mine. I clicked his. I fell down, he picked me up. He fell down, I picked him up. We laughed at each other. We put our hands forward each time the other one fell down. We descended together. Yeah, I mean obviously we often talk about friends who helped you get high and “high” in our lives. But Tej helped me get down. Tej helped me get up while I stumbled upon the rocks of hills and lives. I never thought I would write about this particular trip in this way. But I can actually relate our traits on this trip to our daily life. So until next time, think about every person of your life who picked you up. Laughed at you. And still extended her/his hand when you fell not only when on your way up, but also on your way down!

– Love Avantika.

बनारस!

गंगा की धार
घाट की तन्मयता
अलबेली बनारसी गलियों पर
बहुत कविता कही जा चुकी
मैं पक्का महाल से मणिकर्णिका तक
की धराशायी इमारतों को
कविता में जिंदा रखना चाहती हूँ
मैं हर छोटे बड़े अवसर पर बैनरों से ढक
दिये जाने वाले अस्सी नाले को याद करना चाहती हूँ
राजघाट पुल के नीचे तम्बूओं में बसने वाले बंजारे की कहानी कहना चाहती हूँ
कहना चाहती हूँ कि कैसे लाख बैरीकेट और लाल पीली हरि बत्ती लगने के बाद भी एक बैल के बैठने से घंटों सड़क जाम रहती है
और लिट्टी चोखे के ठेलों को आये दिन पुलिस की लाठी पड़ती है
अलखनंदा की चमक और रफ्तार से मल्लाह अंधेरे में गिरे जा रहे हैं
विश्वविद्यालय के छात्र भूखे लड़ रहे हैं
किसान साल भर से पगार का इंतजार कर रहे हैं
पूरी कचौड़ी लस्सी वाले चाय पकौड़े से रीझ रहे हैं
और कैसे शहर बनारस हलाकान होने के बाद भी बदले जा रहा है

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